Monday, May 7, 2012
Wednesday, February 15, 2012
पिछले दिनों कर्णाटक विधानसभा में जो अनहोनी हुयी, वह एक दुर्भाग्य है। एक और दुर्भाग्य है कि जिस विरोधी पार्टी सदस्य के इशारे पर यह काम अखबारों और दूरदर्शन की विभिन्न समाचार धाराओं में इस खबर को सरगर्मी से दिखाया गया, उसने केवल यह इसलिए किया की विरोधी दल के सदस्य इसमें शामिल हैं। क्या वे सदन की गरिमा की रक्षा के लिए, वहीँ आपत्ति दिखाते हुए उसे बंद नहीं कर सकते थे? दरअसल, वे ऐसा कर देते तो सबको मसाला कैसे मिलता?
एक विधायक जो लाखों लोगों के मत पाकर विधानसभा में पहुंचता है, कितना ग़ैर ज़िम्मेदार हो सकता है, ये इस बात का ताज़ा उदाहरण है।
अभी हाल में ही जो कुछ कर्नाटक विधानसभा में घटित हुआ; उसमें ध्यान देनेवाला पहलू यह है कि विपक्षी दल के सदस्य जिसने इस घटना को मीडिया के सामने लाया, वह इसको सदन के अन्दर ही निबटा सकता था। इस घटना से सदन कि गरिमा को नुक्सान हुआ है। जनता के सामने ये बात आने के बाद आम राय यही बनी होगी कि ऐसा सदन में नहीं होना चाहिए था। तब, यहाँ यह महत्त्वपूर्ण है कि सदन में ये पर्याप्त व्यवस्था हो कि सभी विधायक गरिमा के अनुरूप व्यवहार करें, न कि आम जन का मुद्दा बन जाएँ।
फैसला आप पर!
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